कहानी का नाम: "गुनाह की खामोशी"
उत्तर प्रदेश के एक छोटे से गाँव चंदापुर में सब कुछ शांत सा लगता था। खेत, पगडंडियां, और मिट्टी की सोंधी खुशबू... लेकिन कुछ खुशबुएं जब ज्यादा देर बंद कमरे में कैद रहें, तो सड़ांध बन जाती हैं। यही हुआ नीलम के साथ। उम्र होगी 28 साल, देखने में साधारण, लेकिन आँखों में कुछ अधूरी ख्वाहिशें हमेशा तैरती रहती थीं।
नीलम की शादी हुई थी धीरज से, जो रोज़ी-रोटी के लिए दिल्ली में मजदूरी करता था और साल में एक या दो बार ही घर आता था। गाँव में नीलम अकेली रहती थी—सास-ससुर मर चुके थे, और बच्चा अभी तक नहीं हुआ था। ऐसे में जब पुलवामा नाम का एक 19 साल का लड़का गांव के ही सरपंच के खेतों में काम करने आया, तो नीलम की जिंदगी में कुछ हलचल हुई।
पुलवामा पढ़ा-लिखा नहीं था लेकिन जवान था। उसके शरीर पर मेहनत की ठोकरें थीं, और नीलम की आँखों में अकेलेपन की आग। दोनों की नज़रें कई बार टकराईं, और फिर धीरे-धीरे बातों का सिलसिला शुरू हुआ। कभी पानी देने के बहाने, कभी खेत के खाने का डब्बा पहुंचाने के बहाने, नीलम पुलवामा से मिलने लगी।
गांव में लोगों की आंखें और जुबान दोनों तेज होती हैं। लेकिन नीलम सावधान थी। वो किसी को शक नहीं होने देती थी। पर एक दिन गलती हो ही गई। एक औरत ने उन्हें खेत की झोपड़ी के पास देखा, और बात पूरे गांव में आग की तरह फैल गई। लेकिन पुलवामा चालाक था—उसने तुरंत ही कहानी बना दी कि नीलम उसे नौकरी के लिए मदद कर रही थी।
इस सबके बीच एक दिन पुलवामा अचानक गांव से गायब हो गया। कोई खबर नहीं, कोई चिठ्ठी नहीं। नीलम बेचैन हो गई। उसे डर था कि कहीं पुलवामा ने उसका कोई वीडियो या फोटो तो नहीं लिया? लेकिन सबसे बड़ा झटका उसे उस दिन लगा जब गांव के कुएं में एक लाश मिली—चेहरा बिगड़ा हुआ था, पहचान पाना मुश्किल, लेकिन कपड़ों से साफ था… वो पुलवामा ही था।
पुलिस आई। गांव का सन्नाटा टूट गया। पूछताछ शुरू हुई। और सबकी नज़रें नीलम पर टिक गईं। उसके फोन में पुलवामा के कुछ मैसेज मिले, जिनसे साफ था कि उनके बीच रिश्ता था। लेकिन सवाल था—क्या नीलम ने मारा? या किसी और ने?
जांच में पता चला कि पुलवामा के पास कुछ रिकॉर्डिंग्स थीं—नीलम के साथ की प्राइवेट वीडियो क्लिप्स। शायद वो उसे ब्लैकमेल करने वाला था। पर वो रिकॉर्डिंग्स गायब थीं। फोन नहीं मिला।
पुलिस को शक था कि नीलम ने ही उसे मारा। लेकिन सबूत नहीं थे। गांव के कुछ लोग बोले, “अरे मैडम जी, औरत अकेली रहती है… जवान लड़का था, हो सकता है कुछ उल्टा-पुल्टा हुआ हो।“ लेकिन कोई कुछ पक्का नहीं कह सका।
एक महीना बीत गया, केस ठंडा पड़ गया। लेकिन तीन महीने बाद, दिल्ली पुलिस ने एक मोबाइल फोन की लोकेशन पकड़ी—वो फोन जो पुलवामा का था। और जिस जगह से मिला, वो था—धीरज, नीलम का पति।
जब उसे उठाया गया तो सच बाहर आया। धीरज को सब पता चल गया था। जब वो दिल्ली से अचानक लौटा, उसने अपनी आंखों से पुलवामा और नीलम को देखा था—झोपड़ी के पास, गले में गमछा, होंठों पर हँसी। उसकी मर्दानगी को चुनौती लगी थी।
उसी रात, धीरज ने पुलवामा को बुलाया, बात करने के बहाने। और गला दबाकर मार डाला। मोबाइल फोन रख लिया, ताकि कोई सबूत न बचे। लाश को कुएं में फेंक दिया।
पुलिस के सामने उसने कबूल कर लिया, “बीवी मेरी थी... जिस्म उसका किसी और के साथ था। माफ कर देता तो क्या मर्द कहलाता?”
कोर्ट ने उसे आजीवन कारावास की सजा दी।
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अंत में —
नीलम अब गांव में नहीं रहती। लोगों के ताने, समाज की नजरें और खुद की शर्म—इन तीनों ने उसे एक गुमनाम शहर की गली में बसा दिया। शायद अब भी वो पुलवामा की तस्वीर को देखती हो, या फिर उस रात को याद करती हो जब एक ख्वाहिश ने एक जान ले ली।
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